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नवंबर 21, 2010

घर



तुम्हारा घर जहाज़ का लंगर न बने, बल्कि मस्तूल बने| तुम दरवाज़े में से गुज़र सको, इसके लिए तुम अपने पंख समेटो मत और कहीं छत से टकरा न जाएँ इसलिए सिरों को झुकाओ मत, कहीं दीवारें दरककर गिर न पड़े, इसलिए साँस लेने से डरो मत|

तुम उन मकबरों में मत रहो जो मुर्दों ने जीवितों के लिए बनाये हैं| भले ही तुम्हारा घर भव्य और सुन्दर न हो, लेकिन तुम्हारा घर न तो तुम्हारे राज़ों को छुपाये और न तुम्हारी तृष्णाओं का आश्रय हो|

क्योंकि वह जो तुममे अनंत है, आकाश के महल में रहता है, जिसका फाटक प्रभात का कोहरा है और जिसकी खिड़कियाँ रात की रागनियाँ और खामोशियाँ है |
                                                                                       -खलील जिब्रान

                              

5 टिप्‍पणियां:

  1. अद्भुत विचार हैं खलील जिब्रान के, क्योंकि हम यात्री हैं हमारा घर मस्तूल होना ही चाहिए, मान्यताओं की कमजोर दीवारें, संकीर्णताओं की नीची छतें, पूर्वाग्रहों के कारण संकरे दरवाजे हमारे अनंत स्वरूप को व्यक्त ही नहीं होने देते, जिसके लिये आकाश से रत्ती भर भी कम जगह पर्याप्त नहीं है !

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  2. ज़िन्दगी का पूरा फलसफा भरा है इन पंक्तियों में !
    आदमी को जीने का सही रास्ता दिखाती हैं ये !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  3. सीधी साधी बातों को बहुत ही सीधी साधी हि‍न्‍दी में लि‍खा, अन्‍य कि‍सी भी मक्‍सद के करीब नहीं गये इसका शुक्रि‍या।
    बहुत से लोग बहुत कुछ जानते हैं पर फि‍र भी भेड़चाल से अलग नहीं होते, पता नहीं क्‍यों ? कबीर, खलील जि‍ब्रान, गुरूनानक को पढ़कर भी लोग हि‍न्‍दू या मुसलमानपने से उबर नहीं पाते - पता नहीं क्‍यों ? वेद कुरान गीता बाइबल पढ़कर भी लोग इंसान नहीं बन पाते- पता नहीं क्‍यों ?

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  4. bahut khubsurati se sweet home ka bhakaan kiya hai...bahut bahut bhadai imran ji

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...