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मार्च 04, 2011

पद-चिह्न


मैं सागर के इन तटों पर पानी और रेत के बिच सदा से घूम रहा हूँ | आने वाला ज्वार मेरे पद-चिह्नों  को मिटा देगा और बहने वाली हवा इस झाग को उड़ा ले जाएगी| 

किन्तु सागर और तट सदा विद्यमान रहेंगे |

                                                                         - खलील जिब्रान

6 टिप्‍पणियां:

  1. ...बिल्कुल वैसे ही जैसे हम परमात्मा रूपी सागर और आत्मा रूपी तट पर मन,बुद्धि के चिह्न छोड़ते जा रहे है....जिन्हें वक्त की हवा और लहरें पलक झपकते मिटा देंगी...

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  2. @ अनीता जी बिलकुल सही कहा आपने|

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  3. सागर और तट हमेशा रहेंगे ,दोनों दिखने में अलग है पर वास्तव में एक दूसरे में समाहित है ..तट के फैलने से सागर कम नहीं होता .सागर जब फैलता है तो तट भीगते ज़रूर है........

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  4. @ अंजू जी आपकी बात से सहमत हूँ|

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  5. प्रलय के वर्णन से घबराएँ नहीं क्योंकि जब होगी तब कोई रहेगा ही नहीं ! नया गेटअप स्वागतयोग्य है.

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...