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जनवरी 09, 2012

सात बार अपनी आत्मा से घृणा


मैंने सात बार अपनी आत्मा से घृणा की -

पहली बार, जब मैंने उसे उच्चता प्राप्ति की अभिलाषा में हतोत्साह पाया|

दूसरी बार, जब मैंने उसे अपंग के सामने लंगड़ाते पाया|

तीसरी बार, जब उसे सरल या कठिन का चुनाव करना था और उसने सरल को चुना |

चौथी बार, जब उसने एक पाप किया और यह सोचकर संतोष कर लिया की अन्य भी यह पाप करते हैं|

पाँचवी बार, जबकि कमज़ोरी के प्रति उसने धैर्य दिखाया और अपनी इस धैर्यशीलता को शक्ति का प्रतीक बताया|

छठी बार, जबकि उसने एक चेहरे की बदसूरती पर घृणा एक नज़र डाली और यह न समझा की यह उसी का एक रूप है|

और सांतवी बार तब, जबकि उसने प्रशंसा का एक गीत गाया और इसे अपना 'गुण' व्यक्त किया| 

22 टिप्‍पणियां:

  1. :)...ye ghruna hona bada jaruri hai...na hui to insaan insaan nahi rahta

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  2. bahut hi umda ,khaleel jibraan ki baatein sirf baate hi nhi zindgi ka gehan chintan hai ,....ek aisa nzriya jo .....raah dikhaye.....

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  3. खुद को पा रहा हूं इस रचना में...

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  4. गज़ब के सत्य से रु-ब-रु करवाते भाव हैं…………शानदार आत्मविश्लेषण करने मे सहायक्।

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  5. महान व्यक्ति के महान विचार...प्रस्तुति के लिए बधाई...

    नीरज

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  6. इन्ही सब कारणों से तो आत्मा बेचैन रहती है।

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  7. कल 10/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  8. बहुत गंभीर चिंतन है, इमरान भाई.... परिपक्व भी...
    सादर.

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  9. sach se bhagne ki insaan ki fitrat,
    samajh aa jaye to khud se nafrat...

    Very nice and true :(

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  10. आप सभी लागों का बहुत बहुत शुक्रिया यहाँ तक आने का और पोस्ट पसंद करने का|

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  11. इमरान भाई....
    इतना आसान नहीं है....
    सोचना पड़ेगा और अपने अन्दर झांकना पड़ेगा कुछ भी लिखने से पहले !!

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  12. बहुत ही गहन विचार ... आभार इस उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति के लिए

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  13. वाह...
    वाकई बहुत सार्थक बातें....
    अपने कर्मों का लेखा जोखा हमें खुद ही रखना होता है...सुधार तभी संभव है..

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  14. अंतर अनुशासन ही क्षुद्र जीवन को विराट अस्तित्व की ओर लिए चलता है . खलील जिब्रान उस पथ के प्रदर्शक हैं . आपका आभार फिर से इन वचनों को अपने निकष पर उताड़ने का अवसर देने के लिए..

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  15. बहुत बहुत शुक्रिया आप सभी का |

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  16. मैंने आत्मा से घृणा की, इसमें 'मैं' कौन है, हम तो आत्मा ही हैं न, यह सही है कि उत्साह ही जीवन है..और भी सभी विचार उत्तम हैं.

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  17. अंतस में झाँक कर सोचने पर विवस करते हैं ये विचार !
    आभार !

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  18. एकदम विचारणीय बाते है...
    स्वयं के व्यक्तित्व परिवर्तन के लिये
    इसे खुद में तलाशना बहूत जरुरी है ..
    बेहतरीन पोस्ट ..

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  19. बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर रहे हैं ये विचार ...सुन्दर प्रस्तुति

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  20. महापुरुषों बहुत सुंदर विचार,चिंतन करने योग्य प्रस्तुति
    new post--काव्यान्जलि --हमदर्द-

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...