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जून 14, 2012

नई ख़ुशी


कल रात मैंने एक नई ख़ुशी का अविष्कार किया और जब मैं पहले-पहल उसका उपभोग कर रहा था तब एक देव और एक शैतान मेरे घर की ओर झपटते हुए आए । वे मेरे दरवाज़े पर एक-दूसरे से मिले और मेरी नई रचना के सम्बन्ध में परस्पर झगड़ने लगे ।

एक कहता था,    "यह पाप है।"
दूसरा कहता था, "यह पुण्य है।"

- खलील जिब्रान 

8 टिप्‍पणियां:

  1. गहन भाव लिए बेहतरीन प्रस्‍तुति।

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  2. वाह ! कैसी अनोखी बात...एक ही रचना को पुण्य और पाप बताते थे वे लोग, इसका अर्थ हुआ कि जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि, चीजों में अपना कुछ भी नहीं होता सब कुछ देखने वाले की नजर पर निर्भर करता है, बहुत सुंदर विचार ! हमें बस अपनी नजर को स्वच्छ करना होगा...

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    1. बिलकुल सही कहा आपने अनीता जी दृष्टि ही सृष्टि बन जाती है ।

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  3. चिंतन योग्य पोस्ट. सुन्दर.. थोड़ी विस्तृत होती तो और अच्छा था. सच मच हर बातों के दो पहलू है.

    आभार.

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    1. शुक्रिया संतोष जी.....बात में मर्म होना ज़रूरी है फिर लम्बाई मायने नहीं रखती ।

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति,,,सुंदर रचना,,,,,

    MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: बहुत बहुत आभार ,,

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  5. वाह क्या बात है सभी विचार पढे सभी बहुत ही सटीक एवं सार्थक लगे।

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...