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जून 30, 2012

दो विद्वान


एक प्राचीन नगर में किसी समय में दो विद्वान रहते थे । उनके विचारों में बड़ी भिन्नता थी । एक - दूसरे की विद्या की हँसी उड़ाते थे, क्योंकि उनमे से एक आस्तिक था और दूसरा नास्तिक।

एक दिन दोनों बाज़ार में मिले और अपने अनुयायियों की उपस्थिति में ईश्वर के अस्तित्व पर बहस करने लगे । घंटों बहस करने के बाद एक - दूसरे से अलग हुए।

उसी शाम को नास्तिक गिरजे में गया और वेदी के सामने सर झुकाकर अपने पिछले पापों के लिए क्षमा माँगने लगा । ठीक उसी समय दूसरे विद्वान ने भी, जो ईश्वर की सत्ता में विश्वास करता था, अपनी पुस्तकें जला डालीं क्योंकि अब वह नास्तिक बन गया था ।

- खलील जिब्रान 


14 टिप्‍पणियां:

  1. ओह ...संगत का असर आता ही है ...!!बहुत सुंदर बात ..!!
    आभार .

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    1. बेनामीजून 30, 2012

      शुक्रिया अनुपमा जी ।

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    1. बेनामीजून 30, 2012

      शुक्रिया यशवंत जी ।

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  3. वास्तव में आस्तिकता और नास्तिकता में फर्क ऊपर ऊपर से दिखता है, नास्तिक की गहराई में आस्तिक छिपा है, आस्तिक की गहराई में नास्तिक , बहस से उनके ऊपर के मुल्लमे उतर गए, हम सभी ऐसे ही हैं पाले बदलते रहते हैं तब तक जब तक उसका दीदार नहीं हो जाता और तब कोई कुछ भी कहे...ज्ञानवर्धक पोस्ट !

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    1. बेनामीजून 30, 2012

      शुक्रिया अनीता जी.....सही बात है मन का द्वंद्ध ऐसे ही चलता रहता है.....मर्म तक पहुँचती हैं आप।

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  4. गहन भाव लिए ... उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति ...आभार

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    1. बेनामीजुलाई 01, 2012

      शुक्रिया सदा जी ।

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  5. नास्तिक हूँ या हो गया कहना भी आस्तिक होना ही है ...मैं ईश्वर को नहीं मानता , किसे नहीं मानता , कोई तो है जिसे नहीं मानता !!!!

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    1. बेनामीजुलाई 01, 2012

      शुक्रिया वाणी जी.....आपका तर्क बिलकुल सही है ।

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  6. इसे कहते हैं संगति का गुप्त प्रभाव ... बहुत बढ़िया।

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    1. बेनामीजुलाई 02, 2012

      शुक्रिया पल्लवी जी।

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  7. क्या असर है .. एक का दूसरे पर!

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  8. जीवन में,हम बहुत सी बातों को जानते नहीं,बस मानते हैं। आस्तिकता और नास्तिकता का भाव ऐसा ही है। जो जैसा अनुभव करे,उसे वैसा ही होना चाहिए।

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...