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सितंबर 15, 2012

लोमड़ी


एक लोमड़ी ने सुबह के वक़्त अपनी छाया पर दृष्टि डाली और कहा, "मुझे आज नाश्ते के लिए एक ऊँट मिलना ही चाहिए।"

उसने सुबह का सारा वक़्त ऊँट की तलाश में घूमते हुए गुज़ार दिया, लेकिन जब दोपहर को उसने दूसरी बार अपनी छाया देखी तो कहा, " मेरे लिए तो एक चूहा ही काफी होगा।"

- खलील जिब्रान 

11 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! लोमड़ी तो चूहे से संतोष कर लेगी, पर मानव की लालसा का तो कोई अंत नहीं..सारी धरती का साम्राज्य भी कोई पा ले तो भी उसको तृप्ति नहीं होती..अहंकार जब प्रबल होता है तो मांग भी बड़ी होती है, फिर जब अहंकार टूटता है तो जो मिल जाये उससे ही काम चलाना पड़ता है...

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    1. शुक्रिया अनीता जी.....सही कहा आपने सब अहंकार का ही खेल है ।

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  2. हाहा, बहुत अच्छे! अबोध मन बाहरी स्तिथियों से ही स्वयं के लिए आंकलन करता है... ज्ञान ही अंतर्दृष्टि दे सकती है...
    सादर
    सादर

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    1. शुक्रिया मधुरेश जी.....सही कहा आपने सिर्ग ज्ञान ही अंधकार से बहार निकालता है ।

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    1. खलील जिब्रान की पोस्ट यहाँ शमिल करने के लिए और उस पर इतनी सुन्दर व्याख्या के लिए दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आपका ।

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  4. दोपहर होते-होते लोमड़ी को भी होश आ जाता है। मगर आदमी है कि बेहोशी में ही ज़िंदगी की शाम हो जाती है।

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    1. शुक्रिया आपका....सही कहा आपने....जिब्रान जैसे लोग जगाने के लिए ही आते हैं दुनिया में ।

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...