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जनवरी 04, 2013

बाँसुरी



भारी है मेरी आत्मा अपने स्वयं के पके हुए फल से
कौन अब आएगा, खायेगा और तृप्त होगा?
मेरी आत्मा लबालब भरी है मेरी ही मदिरा से 
कौन अब ढालेगा, पियेगा और ठंडा होगा?

काश मैं एक वृक्ष होता, बिना फूल और बिना फल का 
क्योंकि अधिकता की पीड़ा उजड़ेपन से कहीं अधिक कड़वी है 
और अमीर का दुःख, जिसे कोई ग्रहण नहीं करता 
कहीं बड़ा है एक भिखारी की निर्धनता से, जिसे कोई नहीं देता

काश मैं एक कुआँ होता, सुखा और झुलसा हुआ 
और मनुष्य मेरे अन्दर पत्थर फेंकते 
क्योंकि यह अच्छा है व्यय हो जाना  
अपितु जीवित जलकर उद्गम बनना 
जबकि मनुष्य उसकी बगल से गुजरें और उसका पान न करें 

काश मैं एक बाँसुरी होता, पैर के नीचे कुचली हुई 
क्योंकि यह चाँदी के तार वाली एक वीणा होने से अच्छा है 
ऐसे मकान में, जिसके मालिक की उँगलियाँ न हों 
और जिसके बच्चे बहरे हों,   

- खलील जिब्रान 

19 टिप्‍पणियां:

  1. अधिकता की पीड़ा अधिक है
    ............... मैं खाली बेजान होता ........ हर अनुभूति से परे

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    1. सही कहा रश्मि जी........बहुत शुक्रिया।

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  2. मन की पीड़ा को शब्दों से लिख दिया है ..

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  3. सृष्टि में परमात्मा और मानव के भीतर आत्मा भी तो लबालब भरी है प्रेम से...मन गुजरे चले जाता है उसके पास से उससे बात तक नहीं करता..उसकी तरफ निहारता भी नहीं..हमारा अपना वजूद ही हमसे अनदेखा रह जाता है..बाँसुरी का दर्द एक इशारा है हमारी आत्मा की ओर से..जो प्यार लुटाना चाहती है पर हम...

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    1. सही कहा अनीता जी.......बहुत बहुत शुक्रिया।

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  4. बेहद गहन भावों का संगम ...

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  5. बहुत खूब इमरान जी.... हृदय कि पीड़ा को व्यक्त करती भावपूर्ण रचना !

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  6. मन के गहन दएद को कागज पर उतार लिया...

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  7. अच्छा है व्यय हो जाना ..........सच ही तो है ....

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  8. पूर्णता में अपूर्णता का दर्द....
    अपूर्णता में भी पूर्णता का सुख....!!
    जीवन में उपयोगिता ही सबसे बेहतर है...!
    सुन्दर.....
    अति सुन्दर.....!!

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  9. Bhai imran ji Khaleel Zibran ne is kavita men shyad yahi kaha hai ki jis samaj men kala ki koi kadr na ho wahan kisi kalakar ka jivan mritu se bhi badtar hita hai. Kya main sahi samjha.

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    1. जी हाँ राकिम भाई सही कहा आपने ।

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...