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फ़रवरी 01, 2013

द्वितीय



"मेरा वह द्वितीय जन्म था, जबकि मेरी आत्मा तथा मेरी देह ने परस्पर प्रेम प्रारंभ किया और मिलकर एक हो गए ।"

- खलील जिब्रान 



6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर विचार..आत्मा और देह जीवन भर अजनबी ही बने रहते हैं..एक जन्म में नहीं जन्मों जन्मों तक..जिनके भीतर ऐसा प्रेम घटता है उन्हें ही तो द्विज कहते हैं..

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...