खलील जिब्रान विश्व के महान दार्शनिक,लेखक, चित्रकार और कवि हैं| उनकी रचनायें सारी दुनिया के लोगों के लिए एक अमूल्य धरोहर है|अंधविश्वासों और आडम्बरों के सख्त विरोधी खलील जिब्रान एक महान विचारक थे|इस ब्लॉग के ज़रिये मेरी एक छोटी सी कोशिश की मैं उनके अमूल्य विचारों को सरल भाषा में लोगों के सामने रख सकूँ ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग उनको पढ़ और समझ सकें|
मार्च 15, 2012
फ़रवरी 24, 2012
पूर्णिमा का चाँद
पूर्णिमा का चाँद अपनी सम्पूर्ण आभा लेकर नगर पर उदित हुआ और सभी कुत्ते चाँद की और देखकर भौंकने लगे ।
केवल एक कुत्ता, जो चुप था, अपनी गंभीर वाणी में बोला "व्यर्थ में शांति को जगाकर उसकी निद्रा भंग न करो। तुम्हारे भूंकने से चाँद ज़मीन पर तो आने से रहा ।"
इस पर सब कुत्तों ने भौंकना बंद कर दिया और वहाँ सन्नाटा छा गया ; लेकिन वही उपदेशक कुत्ता शांति बनाये रखने के लिए सारी रात भौंकता रहा ।
- खलील जिब्रान
फ़रवरी 09, 2012
खलील जिब्रान - एक परिचय
संसार के श्रेष्ठ चिंतक महाकवि के रूप में विश्व के हर कोने में ख्याति प्राप्त करने वाले, देश-विदेश भ्रमण करने वाले खलील जिब्रान अरबी, अंगरेजी फारसी के ज्ञाता, दार्शनिक और चित्रकार भी थे। उन्हें अपने चिंतन के कारण समकालीन पादरियों और अधिकारी वर्ग का कोपभाजन होने से जाति से बहिष्कृत करके देश निकाला तक दे दिया गया था।
खलील जिब्रान 6 जनवरी 1883 को लेबनान के 'बथरी' नगर में एक संपन्न परिवार में पैदा हुए। 12 वर्ष की आयु में ही माता-पिता के साथ बेल्जियम, फ्रांस, अमेरिका आदि देशों में भ्रमण करते हुए 1912 में अमेरिका के न्यूयॉर्क में स्थायी रूप से रहने लगे थे।
वे अपने विचार जो उच्च कोटि के सुभाषित या कहावत रूप में होते थे, उन्हें कागज के टुकड़ों, थिएटर के कार्यक्रम के कागजों, सिगरेट की डिब्बियों के गत्तों तथा फटे हुए लिफाफों पर लिखकर रख देते थे। उनकी सेक्रेटरी श्रीमती बारबरा यंग को उन्हें इकट्ठी कर प्रकाशित करवाने का श्रेय जाता है। उन्हें हर बात या कुछ कहने के पूर्व एक या दो वाक्य सूत्र रूप में सूक्ति कहने की आदत थी। वे कहते थे जिन विचारों को मैंने सूक्तियों में बंद किया है, मुझे अपने कार्यों से उनको स्वतंत्र करना है। 1926 में उनकी पुस्तक जिसे वे कहावतों की पुस्तिका कहते थे, प्रकाशित हुई थी। इन कहावतों में गहराई, विशालता और समयहीनता जैसी बातों पर गंभीर चिंतन मौजूद है।
उनमें अद्भुत कल्पना शक्ति थी। वे अपने विचारों के कारण कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर के समकक्ष ही स्थापित होते थे। उनकी रचनाएं 22 से अधिक भाषाओं में देश-विदेश में तथा हिन्दी, गुजराती, मराठी, उर्दू में अनुवादित हो चुकी हैं। इनमें उर्दू तथा मराठी में सबसे अधिक अनुवाद प्राप्त होते हैं। उनके चित्रों की प्रदर्शनी भी कई देशों में लगाई गई, जिसकी सभी ने मुक्तकंठ से प्रशंसा की। वे ईसा के अनुयायी होकर भी पादरियों और अंधविश्वास के कट्टर विरोधी रहे। देश से निष्कासन के बाद भी अपनी देशभक्ति के कारण अपने देश हेतु सतत लिखते रहे। 48 वर्ष की आयु में कार दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होकर 10 अप्रैल 1931 को उनका न्यूयॉर्क में ही देहांत हो गया। उनके निधन के बाद हजारों लोग उनके अंतिम दर्शनों को आते रहे। बाद में उन्हें अपनी जन्मभूमि के गिरजाघर में दफनाया गया।
** हिन्दी विकिपीडिया से साभार **
जनवरी 25, 2012
परदा
मैं मौत के बाद भी जीऊँगा, और मैं तुम्हारे कानों में गाऊँगा,
मैं तुम्हारे आसन पर बैठूँगा हालाँकि बिना शरीर के
और मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे खेतों में जाऊँगा
एक अदृश्य आत्मा बनकर,
मैं तुम्हारे पास तुम्हारी आग के सहारे बैठूँगा
एक अदृश्य अतिथि बनकर,
मौत तो कुछ भी नहीं बदलती, परदे के अलावा
जो की हमारे चेहरे पर पड़ा रहता है,
- खलील जिब्रान
जनवरी 09, 2012
सात बार अपनी आत्मा से घृणा
मैंने सात बार अपनी आत्मा से घृणा की -
पहली बार, जब मैंने उसे उच्चता प्राप्ति की अभिलाषा में हतोत्साह पाया|
दूसरी बार, जब मैंने उसे अपंग के सामने लंगड़ाते पाया|
तीसरी बार, जब उसे सरल या कठिन का चुनाव करना था और उसने सरल को चुना |
चौथी बार, जब उसने एक पाप किया और यह सोचकर संतोष कर लिया की अन्य भी यह पाप करते हैं|
पाँचवी बार, जबकि कमज़ोरी के प्रति उसने धैर्य दिखाया और अपनी इस धैर्यशीलता को शक्ति का प्रतीक बताया|
छठी बार, जबकि उसने एक चेहरे की बदसूरती पर घृणा एक नज़र डाली और यह न समझा की यह उसी का एक रूप है|
और सांतवी बार तब, जबकि उसने प्रशंसा का एक गीत गाया और इसे अपना 'गुण' व्यक्त किया|
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