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मई 27, 2013

एक ही कविता


मुझसे कहा जाता है, "इहलोक (भौतिक जगत) के भोग या परलोक की शांति में से किसी एक को चुन लो।"

और मैं उनसे कहता हूँ, "मैंने दोनों को ही चुन लिया है - इहलोक के आनंदों और परलोक की शांति को।"

"क्योंकि मैं जानता हूँ की उस विराट कवि ने एक ही कविता लिखी है । वही समझी भी पूर्णतया से जाती है और उसका गान भी पूर्ण रूप में संभव है।"

- ख़लील ज़िब्रान 


अप्रैल 17, 2013

पवित्र नगर



पवित्र नगर की राह में, मैं एक यात्री से मिला और उससे पूछा, " क्या पवित्र नगर (तीर्थ) का यही मार्ग है?"

उसने कहा " तुम मेरा अनुगमन करो, एक दिन में ही तुम वहाँ पहुँच जाओगे।"

मैंने उसका अनुगमन किया। हम कई दिन और कई रात चलते रहे, फिर भी पवित्र नगर तक नहीं पहुँच सके ।

और आश्चर्यजनक बात तो यह है कि वह मुझ पर ही क्रोधित हुआ, जबकि स्वयं उसने मुझे अशुद्ध पथ पर डाला था ।

मार्च 05, 2013

उदारता


उदारता उस वस्तु के दान में नहीं, जिसकी तुम्हारी अपेक्षा दूसरे को अधिक आवशयकता है, बल्कि उस वस्तु के दान में है , जिसकी दूसरे की अपेक्षा तुम्हें स्वयं अधिक आवशयकता है ।

- खलील जिब्रान


फ़रवरी 01, 2013

द्वितीय



"मेरा वह द्वितीय जन्म था, जबकि मेरी आत्मा तथा मेरी देह ने परस्पर प्रेम प्रारंभ किया और मिलकर एक हो गए ।"

- खलील जिब्रान 



जनवरी 04, 2013

बाँसुरी



भारी है मेरी आत्मा अपने स्वयं के पके हुए फल से
कौन अब आएगा, खायेगा और तृप्त होगा?
मेरी आत्मा लबालब भरी है मेरी ही मदिरा से 
कौन अब ढालेगा, पियेगा और ठंडा होगा?

काश मैं एक वृक्ष होता, बिना फूल और बिना फल का 
क्योंकि अधिकता की पीड़ा उजड़ेपन से कहीं अधिक कड़वी है 
और अमीर का दुःख, जिसे कोई ग्रहण नहीं करता 
कहीं बड़ा है एक भिखारी की निर्धनता से, जिसे कोई नहीं देता

काश मैं एक कुआँ होता, सुखा और झुलसा हुआ 
और मनुष्य मेरे अन्दर पत्थर फेंकते 
क्योंकि यह अच्छा है व्यय हो जाना  
अपितु जीवित जलकर उद्गम बनना 
जबकि मनुष्य उसकी बगल से गुजरें और उसका पान न करें 

काश मैं एक बाँसुरी होता, पैर के नीचे कुचली हुई 
क्योंकि यह चाँदी के तार वाली एक वीणा होने से अच्छा है 
ऐसे मकान में, जिसके मालिक की उँगलियाँ न हों 
और जिसके बच्चे बहरे हों,   

- खलील जिब्रान